शनिवार, 31 जुलाई 2021

हमारे कर्मों का फल । The fruit of our deeds

 संत हमे समझाते हैं कि अपनी वर्तमान अवस्था को सुधारने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि कौन से विचार और कर्म, हमें शांति और सामंजस्य की अवस्था की ओर ले जाते हैं  हमारी इच्छाएं विचारों को दिशा देते हैं और विचार हमारे कर्मों को निर्धारित करते हैं कोई भी कार्य करने से पहले एक इच्छा, एक इरादा या एक प्रेरणा की तरंग मन में उठती है पहले मन में इच्छा पैदा होती है, फिर मन उस पर विचार करता है और तब किसी भी क्षण उसके अनुसार कार्य करने को विवश हो जाता है 

हमारे व्यक्तित्व के गठन में कर्मों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है बेशक हम कर्म शरीर द्वारा करते हैं, लेकिन यह हमारी सोच का ही नतीजा है अच्छे या बुरे कर्म, सही या गलत सोच का नतीजा है विचार ही हमारी सफलता या असफलता का मूल्य आधार होते हैं हमारी सोच ही हमारे दृष्टिकोण को डालती है, फिर हमारा दृष्टिकोण ही तय करता है कि हम सुखी हैं या दुखी यह दृष्टिकोण, परिस्थितियों से, सफलताओ या विफलताओ से अमीरी गरीबी, बीमारी-तंदुरुस्ती से कहीं ज्यादा महत्व रखता है यदि हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक है तो हम पूरी से पूरी परिस्थिति को भी अपने हित में बदल लेंगे यदि हमारा दृष्टिकोण नकारात्मक है तो हम उत्तम से उत्तम परिस्थिति में भी दुखी ही रहेंगे इसलिए जीवन में सुख हो या दुख हमारी प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम है वास्तव में हमारे जीवन का चित्र वैसा ही बनता है जैसा रंग हम उन में भरते हैं, हमारी प्रतिक्रिया ही जिंदगी को आकार देती है अच्छे कर्मों का परिणाम सुखी होता है, दुख नहीं बुरे कर्मों का परिणाम दुख ही होता है, सुख नहीं 

मन कंप्यूटर की तरह काम करता है- इसमें जो कुछ भी भरा जाता है, वही स्क्रीन पर नजर आता है। सबसे पहले मन में धारणाएं बनती है फिर उन धारणाओं पर सोचने से उनकी छाप मन पर एक गहरी लीक बनकर छा जाती है यह लीके इतनी गहरी हो जाती हैं कि हम इनके अनुसार पूर्व नियोजित ढंग से कार्य करने पर बाध्य हो जाते हैं इसीलिए यह बहुत जरूरी है कि हम अपनी सोच के प्रति सतर्क रहेअपने विचारों पर हमें कड़ी नजर रखनी चाहिए और केवल उन्हीं विचारों को पनपने देना चाहिए जो एक सही दृष्टिकोण को विकसित करें तथा जो हमें ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करें जिनमें हमारी भलाई है 

धन्यवाद

                                                               
कर्मों का फल, कर्मों, फल


Translation in English: The fruit of our deeds

The saints explain to us that in order to improve our present state, we must first understand what thoughts and actions lead us to a state of peace and harmony. Our desires give direction to thoughts and thoughts determine our actions. Before doing any action a wave of a desire, an intention, or an inspiration arises in the mind. First, a desire arises in the mind, then the mind considers it, and then at any moment, it is compelled to act accordingly.

The role of Karma in the formation of our personality is very important. Of course, we do karma through the body, but it is the result of our thinking. Good or bad karma is the result of right or wrong thinking. Thoughts are the basis of our success or failure. Our thinking determines our attitude, then it is our attitude that decides whether we are happy or sad. From this point of view, wealth by circumstances, successes, or failures is more important than poverty, illness, and wellness. If our attitude is positive, then we will completely change the whole situation in our own interest. If our attitude is negative, we will remain unhappy even in the best of circumstances. Therefore, happiness or sadness in life is the result of our reactions. In fact, the picture of our life is formed as the colors we put in them, our reaction gives shape to life. Good deeds result in happiness, not sorrow. The result of bad deeds is only sorrow, not happiness.

The mind works like a computer – whatever is put in it, is reflected on the screen. First of all, perceptions are formed in the mind. Then by thinking on those concepts, their impression is left on the mind as a deep leak. These leaks become so deep that we are compelled to act according to them in a pre-planned manner. That is why it is very important that we be careful about our thinking. We should keep a close watch on our thoughts and allow only those thoughts to flourish which develop the right attitude and which inspire us to do such things in which our good Is.

Thank you

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

ईश्वर पर विश्वास I faith in god

 दोस्तों एक बार की बात है झाड़े का दिन था | और शाम होने वाली थी | आसमान में बादल छाए हुए थे | नीम के पेड़ पर बहुत कौवे बैठे हुए थे | वह बार-बार कांव-कांव कर रहे थे | और एक दूसरे से झगड़ा भी कर रहे थे ,उस समय एक मैंना वहां आई, और उसी पेड़ की एक डाल पर बैठ गई | मैना को देखते ही कई कौवे उस पर टूट पड़े बेचारी मैना ने कहा बादल बहुत है ,इसलिए अंधेरा बहुत हो गया है| और मैं अपना घोंसला भी भूल गई हूं | इसलिए आज रात मुझे यहां बैठने दो कौवो ने कहा 'नहीं यह हमारा पेड़ है, तू यहां से भाग जा मैना बोली यह पेड़ ईश्वर ने बनाए हैं इस सर्दी में अगर वर्षा हुई और ओले पड़े ईश्वर ही हमें बचा सकते हैं |  मैं बहुत छोटी हूं और तुम्हारी बहन भी हूं ,तुम लोग मुझ पर दया करो और मुझे यहां बैठने दो कौवो ने कहा तेरी जैसी बहन हमें नहीं चाहिए तू बहुत ईश्वर का नाम लेती है ईश्वर के भरोसे ही तू यहां से चली क्यों नहीं जाती तू नहीं जाएगी तो हम सब तुझे मार देंगे कौवो को कांव-कांव करते अपनी तरफ झपटते देखकर बेचारी मैना वहां से उड़ गई और थोड़ी दूर जाकर एक आम के पेड़ पर बैठ गई रात को आंधी आई बादल गरजे और बड़े-बड़े ओले बरसने लगे कौवे कांव-कांव करके चिल्लाए इधर से उधर थोड़ा बहुत उड़े परंतु ओलों की मार से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े बहुत सारे मर गए मैना जिस आम के पेड़ पर बैठी थी ,उसकी एक डाली टूट कर गिर गई डाल टूटने से उसके झड़ के पास एक जगह हो गई छोटी मैना उसमें घुस गई और उसे एक भी ओला नहीं लगा |

सवेरा हुआ और कुछ देर बाद चमकीली धूप निकली मैंना उसमें से बाहर निकली और पंख फैलाकर चेहकने लगी उसने भगवान को प्रणाम किया | ओलों से घायल पड़े कौवो ने मैंना को उड़ते देखकर कहा मैंना बहन तुम रात भर कहां रही थी | ओलो से किसने बचाया मैंना ने कहा मैं आम के पेड़ पर अकेली बैठी भगवान से प्रार्थना करती रही और भगवान ने ही मेरी मदद की |

दोस्तों दुखी पढ़े और असहाय अजीब को ईश्वर के सिवाय कोई नहीं बचा सकता | जो भी ईश्वर पर विश्वास करता है | और ईश्वर को याद करता है ईश्वर सभी आपत्ति और विपत्ति में उसकी सहायता करते हैं और उसकी रक्षा करते हैं ईश्वर की माया निराली है हमारे समझने में कमी हो सकती है परंतु ईश्वर के करने में नहीं ...तो दोस्तों आपको कैसी लगी आज की यह कहानी कमेंट में जरूर बताइए |

                                                                  
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सोमवार, 26 जुलाई 2021

मानव शरीर क्या है I Human body

 क्या हमने अपने शरीर के बारे में सोचा है?.. यह 12 मंजिलों का घर जिसमें हम निवास करते हैं ? कितना आश्चर्यजनक है? इसमें कौन-कौन से अमोलक भंडार छिपे हैं ? इस अंधेरी, गहरी गुफा में कितने असली और चमकीले रत्न हीरे मोती भरे पड़े हैं? हमने कभी इन बातों के बारे में सोचा ही नहीं | क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि जिस घर में हम वर्षों से रह रहे हैं, उसके अंदर झांकने की हमने कभी चेस्टा ही नहीं कि? प्रतिदिन हम कुछ समय इस घर की बाहरी सफाई और संभालने में लगते हैं | सच तो यह है हम में से ज्यादातर लोग मिट्टी के इस नाशवान घरौंदे की बाहरी सजावट में तो बहुत समय बिता देते हैं परंतु कभी भी यह देखने का यत्न ही नहीं करते कि इसके भीतर कैसी-कैसी अद्भुत निंदिया छिपी पड़ी है | इस प्रकार हम यह नहीं जान पाते कि हम असली अनमोल हीरे की खान के स्वामी है |

वास्तव में सब महात्मा जिन्होंने भौतिक जागृत और आत्मा के बारे में छानबीन की है, इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमारे शरीर में ही सब कुछ है हमारे अंदर यह दृश्यमान संसार और अदृश्य जगत दोनों ही है| सब महात्माओं का यह मत है कि प्रभु प्राप्ति केवल मनुष्य शरीर में ही हो सकती है| अंततः जो व्यक्ति अदृश्य, सूक्ष्म और आध्यात्मिक मंडलों की यात्रा करना चाहता है, उसे अपने ही शरीर के अंदर उनकी खोज करनी चाहिए | उस महान कलाकार प्रभु का असली कौशल अंतर में ही देखा और समझा जा सकता है | बाहर का दृश्यमान जगत केवल धोखा है | मानव शरीर तथा समूचे ब्रह्मांड की असलियत इस शरीर से बाहर कहीं भी साफ तौर पर नहीं देखी जा सकती |

गुरु महाराज ने भी कहा है :

सभ किछ घर मह बाहर नाही || बाहर टोले सो भरम भूलाही ||

अर्थात: इस घर के गुप्त खंडों की खोज करनी चाहिए जिसके बारे में ईसा कहते हैं, 'मेरे पिता के महल में कई भवन है|' ऋषि मुनि इस शरीर को 'नौ द्वारों का घर' कहते हैं | कई बार इसे 'दस द्वारों का भवन' भी कहा जाता है | उनमें से नौ द्वार बाहर की ओर खोलते हैं, जिनके रास्ते हमारी शक्तियां बाहर व्यर्थ खर्च हो जाती हैं | दसवां दरवाजा अंदर प्रभु के महल के रास्ते की ओर खुलता है| नौ द्वार- हमारी दो आंखें, दो कान, नाक के दो छेद, एक मुंह तथा नीचे इंद्रियों के दो छेद हैं | दस वा दरवाजा दोनों आंखों के पीछे भूमध्य में है, जिसे 'तीसरा तिल', 'शिव नेत्र' अथवा 'तीसरी आंख' कहा जाता है |

धन्यवाद
                                                            
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Translation in English:   Human body  

Have we thought about our body?.. This 12 Floors house in which we live? How amazing is it? Which Amolak reserves are hidden in it? How many real and sparkling gems, diamonds, and pearls lie in this dark, deep cave? We never thought about these things. Isn't it surprising that we have never tried to peek inside the house we have been living in for years? Every day we spend some time cleaning and maintaining the exterior of this house. The truth is that most of us spend a lot of time in the exterior decoration of this perishable earthen house, but never even try to see what wonderful naughty lies hid inside it. Thus we do not know that we are the owners of the real precious diamond mine.

In fact, all the mahatmas who have inquired about the material awakened and the soul have come to the conclusion that everything is in our body, within us, this is both the visible world and the invisible world. It is the opinion of all the mahatmas that attainment of GOD can be done only in the human body. Ultimately the person who wishes to travel to the invisible, subtle, and spiritual circles must seek them within his own body. The real skill of that great artist Prabhu can be seen and understood from within. The visible world outside is only a deception. The reality of the human body and the entire universe cannot be clearly seen anywhere outside this body.     

Guru Maharaja has also said: Everything is within the home of the self; there is nothing beyond.

Meaning: The secret sections of this house should be discovered about which Jesus says, 'My father's palace has many buildings.' Sage Muni calls this body the 'home of the nine gates'. Sometimes it is also called 'the building of ten gates'. Out of them, nine gates open outwards, through which our energies are spent in vain. The tenth door opens inside towards the way to the palace of the Lord. Nine gates - We have two eyes, two ears, two holes in the nose, one mouth, and two holes for the senses below. The tenth door is in the Mediterranean behind both the eyes, which is called 'Third Mole', 'Shiva Netra' or 'Third Eye'.

Thank you
                                    

हमारे कर्मों का फल । The fruit of our deeds

  संत  हमे  समझाते हैं कि अपनी वर्तमान अवस्था को सुधारने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि कौन से विचार और कर्म, हमें शांति और सामंजस्...